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गीता प्रेस, गोरखपुर >> आशा की नयी किरणें

आशा की नयी किरणें

रामचरण महेन्द्र

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :214
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1019
आईएसबीएन :81-293-0208-x

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प्रस्तुत है आशा की नयी किरणें...

हमें क्या इष्ट है ?


आप अपना अक्रिय ध्यान उस व्यक्तिकी ओर मत कीजिये जो आपसे अनुग्रह अथवा लाभ उठाना चाहता है। यद्यपि आपको दूसरेकी भावनाएँ ग्रहण करनी चाहिये, तथापि आपको अपने मनकी ऐसी विहित वृत्ति रखनी चाहिये, जिससे आपपर किसी अवाच्छनीय प्रभावका आक्रमण न हो सके। आपको द्वारपालके समान स्थिर रहना चाहिये तथा किसी अनुचित तथा अनर्थकारी सूचना  (Suggestion) का संचार मनके भीतर न होने देना चाहिये, बाहर भेजा हुआ प्रत्येक विचार आपकी इच्छाके वशमें होना चाहिये। जबतक सत्यभाषणका स्वभाव स्थिर रूपसे न बन जाय, तबतक प्रत्येक शब्दको सावधानीसे बोलते रहिये तथा प्रत्येक कार्य सूक्ष्म अन्तरात्माकी अनुमतिसे करते रहिये। प्रत्येक कार्यमें अपनी सच्ची संकल्प-शक्तिका संचार करते रहिये।

दार्शनिक कैन्टने एक स्थानपर निर्देश किया है कि नीतिमय जीवनका प्रारम्भ होनेके लिये विचारक्रममें परिवर्तन तथा आचारका ग्रहण आवश्यक है। भारतीय परिभाषाके अनुसार-

सत्येन लथ्यस्तपसा ह्मेष आत्मा
सम्यग् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
(उपनिषद्)

अर्थात् सत्य, तप तथा सात्त्विक ज्ञान और नित्य निर्विकार रहनेसे ही आत्मतत्त्वका दर्शन हो सकता है। ये सभी बातें मन:साधनाकी ओर संकेत करती हैं। जीवनमें दर्शनका फल है, मानस सत्यका उदय। साधनाकी भावनासे सात्त्विकी श्रद्धाका जन्म होता है। चित्तके विषयको अपने अध्यवसायकी क्षमताके अनुभवका विषय बना सकना ही श्रद्धाका लक्षण है। भारतीय विचारकोंने अपने वाङ्मयके उषःकालसे ही इस महत्त्वपूर्ण तत्त्वको समझकर उसका प्रचार किया है। ज्ञानसिद्धि, ऋषि-महर्षियोंका जो साक्षात्कार था, उसको उन्होंने 'श्रुति' कहा है। श्रुतिका जन्म प्रज्ञासे होता है। प्रज्ञा (Intuition) ज्ञान-प्राप्तिका सबसे सूक्ष्म साधन है। योग-समाधिके द्वारा चित्तको संस्कृत करनेका फल हमारे ज्ञान-यन्तके लिये पतञ्जलिने यों बतलाया है-'ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा' (पा. यो० १। ४८) अर्थात् आध्यात्मिक दर्शनकी उच्चतम अवस्थामें ऋतम्भरा प्रज्ञाका उदय होता है। ऋत जिसमें भरता हो, ऐसी बुद्धि ऋतम्भरा है। मनके तर्क-वितर्कद्वारा संचय होनेवाला ज्ञान सत्य है। हृदयकी अनुभूति या तत्त्वसाक्षात्कारसे उपलब्ध अनुभव 'ऋत' है। योगीकी प्रज्ञा ऋतात्मक ज्ञानका भरण करती है।

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    अनुक्रम

  1. अपने-आपको हीन समझना एक भयंकर भूल
  2. दुर्बलता एक पाप है
  3. आप और आपका संसार
  4. अपने वास्तविक स्वरूपको समझिये
  5. तुम अकेले हो, पर शक्तिहीन नहीं!
  6. कथनी और करनी?
  7. शक्तिका हास क्यों होता है?
  8. उन्नतिमें बाधक कौन?
  9. अभावोंकी अद्भुत प्रतिक्रिया
  10. इसका क्या कारण है?
  11. अभावोंको चुनौती दीजिये
  12. आपके अभाव और अधूरापन
  13. आपकी संचित शक्तियां
  14. शक्तियोंका दुरुपयोग मत कीजिये
  15. महानताके बीज
  16. पुरुषार्थ कीजिये !
  17. आलस्य न करना ही अमृत पद है
  18. विषम परिस्थितियोंमें भी आगे बढ़िये
  19. प्रतिकूलतासे घबराइये नहीं !
  20. दूसरों का सहारा एक मृगतृष्णा
  21. क्या आत्मबलकी वृद्धि सम्मव है?
  22. मनकी दुर्बलता-कारण और निवारण
  23. गुप्त शक्तियोंको विकसित करनेके साधन
  24. हमें क्या इष्ट है ?
  25. बुद्धिका यथार्थ स्वरूप
  26. चित्तकी शाखा-प्रशाखाएँ
  27. पतञ्जलिके अनुसार चित्तवृत्तियाँ
  28. स्वाध्यायमें सहायक हमारी ग्राहक-शक्ति
  29. आपकी अद्भुत स्मरणशक्ति
  30. लक्ष्मीजी आती हैं
  31. लक्ष्मीजी कहां रहती हैं
  32. इन्द्रकृतं श्रीमहालक्ष्मष्टकं स्तोत्रम्
  33. लक्ष्मीजी कहां नहीं रहतीं
  34. लक्ष्मी के दुरुपयोग में दोष
  35. समृद्धि के पथपर
  36. आर्थिक सफलता के मानसिक संकेत
  37. 'किंतु' और 'परंतु'
  38. हिचकिचाहट
  39. निर्णय-शक्तिकी वृद्धिके उपाय
  40. आपके वशकी बात
  41. जीवन-पराग
  42. मध्य मार्ग ही श्रेष्ठतम
  43. सौन्दर्यकी शक्ति प्राप्त करें
  44. जीवनमें सौन्दर्यको प्रविष्ट कीजिये
  45. सफाई, सुव्यवस्था और सौन्दर्य
  46. आत्मग्लानि और उसे दूर करनेके उपाय
  47. जीवनकी कला
  48. जीवनमें रस लें
  49. बन्धनोंसे मुक्त समझें
  50. आवश्यक-अनावश्यकका भेद करना सीखें
  51. समृद्धि अथवा निर्धनताका मूल केन्द्र-हमारी आदतें!
  52. स्वभाव कैसे बदले?
  53. शक्तियोंको खोलनेका मार्ग
  54. बहम, शंका, संदेह
  55. संशय करनेवालेको सुख प्राप्त नहीं हो सकता
  56. मानव-जीवन कर्मक्षेत्र ही है
  57. सक्रिय जीवन व्यतीत कीजिये
  58. अक्षय यौवनका आनन्द लीजिये
  59. चलते रहो !
  60. व्यस्त रहा कीजिये
  61. छोटी-छोटी बातोंके लिये चिन्तित न रहें
  62. कल्पित भय व्यर्थ हैं
  63. अनिवारणीयसे संतुष्ट रहनेका प्रयत्न कीजिये
  64. मानसिक संतुलन धारण कीजिये
  65. दुर्भावना तथा सद्धावना
  66. मानसिक द्वन्द्वोंसे मुक्त रहिये
  67. प्रतिस्पर्धाकी भावनासे हानि
  68. जीवन की भूलें
  69. अपने-आपका स्वामी बनकर रहिये !
  70. ईश्वरीय शक्तिकी जड़ आपके अंदर है
  71. शक्तियोंका निरन्तर उपयोग कीजिये
  72. ग्रहण-शक्ति बढ़ाते चलिये
  73. शक्ति, सामर्थ्य और सफलता
  74. अमूल्य वचन

विनामूल्य पूर्वावलोकन

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